यह सबसे दुखद कहानियों में से एक है। यह कहानी एक ऐसे बच्चे के बारे में है जिसकी मात्र 12 वर्ष की आयु में सिर के पिछले हिस्से में गोली मार कर तब हत्या की गयी जब वह स्कूल से अपनी साइकिल पर घर जा रहा था। उसे इस बात की सजा दी गयी थी की उसने बाल मजदूरी (child labour) के खिलाफ आवाज उठाई थी।

इस का नाम इकबाल मसीह था और वह लाहौर (पाकिस्तान) के एक गाँव में रहता था। 1982 में उसका जन्म एक अत्यंत गरीब माँ बाप के घर में हुआ था। जब वह 5 वर्ष का था तभी उसके पिता ने कुछ पैसों के लिए उसे “बंधवा गुलाम” (bondage) के तौर पर एक ऐसे आदमी को बेच दिया गया था जिसकी कालीन (carpet) की फैक्ट्री थी। उसके पिता को इन पैसों की जरुरत इकबाल की माँ के operation के खर्च के लिए थी।

इसका मतलब था इकबाल तब तक आजाद नहीं हो सकता था जब तक उसका पिता carpet फैक्ट्री के मालिक से लिए पैसे नहीं चूका देता। और आजाद होने का उसका वो सपना दिन प्रतिदिन समाप्त होता चला गया क्यूंकि उसके परिवार की financial condition लगातार खराब होती चली जा रही थी।

हर बंधवा गुलाम की तरह इकबाल से न सिर्फ काम करवाया जाता था बल्कि बहुत सी यातनाएं भी दी जाती थी। उस से सप्ताह के 7 दिन 12 घंटे का काम लिया जाता था जिस में केवल 30 मिनट से भी कम का आराम शामिल होता था। इकबाल के साथ साथ carpet फैक्ट्री में काम कर रहे किसी भी बच्चे को पर्याप्त खाना नहीं दिया जाता था। जिस वजह से सभी बच्चे कुपोषण और कमजोरी का शिकार हो जाते थे। मगर फेक्टरी मालिक को इससे फायदा पहुँचता था। इस के पीछे का कारण था कि हाथ जितने छोटे और कमजोर हो carpet को बुनने के लिए उतना ही अच्छा माना जाता था।

यातनाओं का यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा और फिर एक दिन वह हिम्मत कर फेक्ट्री से भाग निकला। भागने के बाद नजदीकी पुलिस थाने ने जाकर सारी बात बताई कि किस तरह उसके मालिक ने उसे गुलाम बना कर रखा है। मगर पुलिस वाले ने थोड़ी सी रिश्वत के बदले इकबाल को उसके मालिक के हवाले कर दिया। इस के बाद इकबाल की हालत और भी ज्यादा बुरी हो गयी।

उसको उसके साथी बचों के साथ अब लोहे की chain से बांध कर रखा जाता था। किसी मासूम की ऐसी हालत देख कर दुनिया का कोई भी इंसान पिघल सकता था मगर फेक्ट्री मालिक पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। एक दिन इकबाल को पता चला कि पाकिस्तान supreme court ने child labour पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इकबाल फिर से भागने की planning करने लगा और एक दिन मौका देख कर वहां से फरार हो गया।

मगर इस बार वह poilce के पास नहीं गया। इकबाल ने भागने के बाद वहां की बंधवा मजदूर हित के लिए काम करने वाली संस्था Bonded Labour Libration Front (BLLF) से मदद मांगी। जल्दी ही उसकी कहानी BLLF के chairman को मालूम हुई जिसने इकबाल को उसेक मालिक को पैसे चूका कर आजाद करने में उसकी मदद की। अब तक वह 4 वर्ष की कड़ी यातनाएं सह चूका था।

उस दिन के बाद इकबाल ने बंधवा गुलाम मजदूरी की awareness लोगों तक पहुँचाने और बचों को छुडवाने का mission बना लिया। उसने पाकिस्तान की हर उस जगह जाकर लोगों में awareness फैलाई जहाँ बाल मजदूरी का काला धंधा होता था। जल्दी ही अपने नेक काम के लिए इकबाल पाकिस्तान की मीडिया में भी आने लगा। यहाँ तक की इकबाल ने बहुत से international visits भी की और अनेकों international forum में अपने विचार और सुझाव रखे।

इसके साथ ही उसने अपनी पढाई दोबारा से शुरू कर दी और 4 वर्ष की पढाई को अगले दो वर्ष में ही पूरा कर दिया। इकबाल का कहना था कि “बचों के हाथों में कलम होनी चाहिए औजार नहीं”।

इकबाल ने एक वर्ष में ही 3000 से ज्यादा बचों को भगाने या आजाद करने में मदद की। माना जाता है कि इकबाल के द्वारा फैलाई जा रही awareness की वजह से 2 वर्षों में 30,000 से ज्यादा बचों को बाल मजदूरी से छुड्वाया जा सका। अब तक 3,00,000 से ज्यादा बचों को बाल मजदूरी से आजाद किया जा चूका है।

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एक अनुमान के मुताबिक अकेले पाकिस्तान में ही 20 लाख से ज्यादा बंधवा बाल मजदूर हैं। और इसका कारण है वहाँ का carpet माफिया। पाकिस्तान में carpet इंडस्ट्री करोड़ों रूपये की है और इसमें काम करने के लिए इसके मालिक बच्चों से बंधवा मजदूरी करवाते हैं। इकबाल की इस movement का असर सीधा-सीधा असर वहां के carpet industry के मालिकों पर पड़ रहा था। इसी के चलते इकबाल की जिन्दगी को खतरा रहता था। ये बात उसके साथ काम करने वाले लोग और संस्थाएं अच्छी तरह जानती थी।

एक दिन जब वह अपने स्कूल से अपने घर आ रहा था तो एक साजिश कर के 12 वर्ष के उस मासूम के सर पर पीछे से गोली मार दी गयी। carpet माफिया ने उसे मासूम बचों के अधिकार के लिए लड़ने, बंधवा बाल मजदूरी के किलाफ़ लड़ने की सजा दी।

एक बार जब वह अमेरिका में था और वापिस पाकिस्तान आना चाहता था तो उस से पूछा गया था की वह उस जगह वापिस क्यूँ जाना चाहता है जहाँ उसकी जान को खतरा है? इस बात पर इकबाल का जवाब था कि “मेरा mission मेरे जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है”

इकबाल को उसके महत्वपूर्ण योगदान और बहादुरी के लिए बचों का सबसे बड़ा पुरूस्कार “The World’s Children’s Honorary Award” दिया गया।

Categories: motivational

Manoj Sharma

Writer, Trainer and Motivator

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