यह कहानी एक बहादुर जापानी सैनिक की है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद भी 28 वर्षों तक अपने देश के लिए युद्ध और संघर्ष जारी रखा।

इसका नाम है Hiroo Onoda। Hiroo Onoda जापान में ही एक Chinese ट्रेडिंग कंपनी के लिए काम करता था। जब वह 20 वर्ष का था तो उसे सेना में भर्ती के लिए बुलाया गया और उसने तुरंत अपनी नौकरी छोड़ी और सेना में भर्ती हो गया।

उसकी कबिकीयत को देखने के बाद उसे Nakano School में Imperial Army Intelligence Officer की ट्रेनिंग के किये चुना गया। उसकी ट्रेनिंग में उसे सिखाया गया कि Guerrilla fight कैसे की जाती है और विषम परिस्थिति में कैसे जिन्दा रहा जाता है। उसे ये भी सिखाया गया कि दुश्मन के इलाके में महीनों तक किस तरह अकेले भी जंगलों में रहकर दुश्मन से जुड़ी जानकारी एकत्रित की जाती है और समय आने पर कैसे दुश्मनो को चुप कर मारा भी जा सकता है।

Young Hiroo Onoda

दिसंबर 1944 को उसे फिलीपीन के Lubang द्वीप पर जाने का आदेश दिया गया। उसके कमांडर Major Yoshimi Taniguchi का सख्त आदेश था कि जिस mission पर उसे भेज जा रहा है उसमें कई वर्ष भी लग सकते है, हो सकता है उसे सिर्फ नारियल खा कर कर ही जिंदा रहना पड़े। मगर किसी भी हालत में वह दुश्मन से जुड़ी जानकारी एकत्रित करेगा और हर हाल में जिंदा रहेगा। उस से वादा किया गया कि युद्ध जीत जाने के बाद उसे वहां से ले जाने के किये Japan के सेना वहां जरूर आएगी।

Onoda को इसके बाद फिलीपीन के एक टापू पर छोड़ दिया गया। जहां उसने पहले से रह रहे कुछ जापानी सैनिको से संपर्क किया और अपने mission पर कार्य करने लगा। कुछ ही सप्ताह बाद दुश्मन के सैनिकों ने उन पर हमला किया जिसमें जापानी सैनिक टुकड़ी को बुरी तरह से खदेड़ दिया गया।

इस स्थिति से निपटने के लिए जापानी सैनिकों ने 4-4 के समूह में बंटकर जंगल मे छिपने का plan बनाया। इनमे से ज्यादातर समूह को दुश्मनों ने ढूंढकर मार डाला। मगर कुछ अन्य समूहों समेत Onoda और उसके समूह के तीन साथियों को दुश्मन न ढूंढ सके।  खाने के सामान की कमी के चलते चारों को जंगली संसाधनों और खाने पर निर्भर रहना पड़ा। और कभी कभी आस पास के गांव वालों को डराकर खाने के सामान का इंतजाम करते थे। Onoda की command में उनके साथी कई महीनों तक Guerrilla fight के जरिए दुश्मन के टक्कर देते रहे और मारते रहे।

अक्टूबर 1945 को एक दिन गांव के खेतों में कुछ गांव को डराने जब पहुंचे तो गांववालों ने कुछ कागज के टुकड़े दिखाते हुए कहा कि युद्ध अगस्त 1945 को ही समापत हो गया जिसमे जापान की हार हो गई है। उन्हें ये भी बताया गया कि अमेरिका ने दो परमाणु बम जापान पर गिराए है जिसके बाद जापान ने हार स्वीकार कर युद्ध समापत करने की घोषणा की है।

यह बात बचे हुए सभी समूहों में अत्यधिक discuss की गई और निष्कर्ष निकाला गया कि यह दुश्मनों की एक चाल है जिसके जरिए दुश्मन उनको जंगल से बाहर निकालना चाहते हैं। यह इसलिए भी विश्वास करने योग्य नहीं था क्योंकि वो जानते थे ऐसा कोई बम आज तक किसी ने देखा ही नहीं था जो शहर को ही नष्ट कर दे। इसके इलावा कुछ दिन ही पहले एक जापानी समूह को दुश्मनों ने मार गिराया था।

इंसान को कभी हार नहीं माननी चाहिए. मैंने कभी हार नहीं मानी. मैं हारने से नफरत है – Hiroo Onoda 

Onoda और उसके साथियों ने अपना काम जारी रखा। वो गांववालों को लूटते और कभी कभी मार भी देते और जैसे तैसे जंगलों में छिपकर दुश्मनों पर हमला कर उन्हें भी मारते। गांववालों ने दुःखी होकर अपनी सरकार से गुहार लगाई जिसके बाद एक विमान से पूरे जंगल मे पर्चे फेंकवा दिए गए। इन पर्चों में लिखा था कि विश्व युद्ध समापत हो गया है और अब वो surrender कर अपने देश जा सकते हैं। इसके अंत मे यह भी लिखा गया था कि यह आदेश General Yashimata की तरफ से है।

इन पर्चों पर लिखी बात Onoda और उसके साथियों के गले नहीं उतर रही थी कि जापान हार गया है। वो अभी भी यह मानते थे कि जापान जरूर जीतेगा। और जब जापान जीतेगा तब जापानी सैनिक उन्हें लेने वहां जरूर आएंगे। इसका मतलब था कि युद्ध अभी भी चल रहा है और यह सब दुश्मनों की एक चाल है।

जब बात नहीं बनी तब और ज्यादा पर्चे बिखेरे गए, loudspeakers से जंगलों में घोषणाएं करवाई गई। यहां तक कि जापानी अखबार से फ़ोटो लेकर उसके पर्चे बनवाये गए और जंगल मे फिंकवाये गए। मगर हर बार कुछ न कुछ ऐसा रहता जो Onoda और उनके साथियों के मन मे शक पैदा करता कि यह दुश्मनों की एक चाल है।

यही सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा। गोलियों की आवाजें कम हुई, अब बर्दी पहने लोग भी जंगल के आस-पास बहुत ही कम नजर आते थे। गांवों में सभी लोग civillian dress में नजर आते थे। मगर जैसे ही वो इन गांव वालों को डराने के लिए गोली चलाते तो कुछ ही समय मे सैनिक टुकड़ी वहां पहुंच जाती। यह देख Onoda और साथियों को पक्का यकीन हो गया कि यह भी दुश्मनों की एक चाल है। और अभी भी गांववालों की वेशभूषा में दुश्मन मौजूद है।

इसके 5 साल बीत जाने के बाद उनके एक साथी ने surrender करने का मन बना लिया था और बाकी तीन से छुपाकर वह भाग निकला और सरेंडर कर दिया। इसके बाद तो Onoda और बाकी के दोनों साथी और चौंकना हो गए। उन्होंने अपनी position और plan दोनों बदल दिया। वो जानते थे कि दुश्मन उनके साथी से उनका सुराग जरूर पता लगा लेंगे।

One must always be civic-minded. Every minute of everyday for 30 years, I served my country. I have never even wondered if that was good or bad for me as an individual. – Hiroo Onoda

इसके 5 वर्ष बाद तीन में एक और साथी को मार गिराया गया। अब मात्र दो लोग ही बचे थे। उन दोनों ने अगले 17 वर्ष जंगल में बिताए और दुश्मन से जुड़ी जानकारी एकत्रित करते रहे। उन दोनों को अभी भी पूरा यकीन था कि विश्वयुद अभी समापत नहीं हुआ है। आखिर Onoda को यही सब आदेश देकर तो यहां भेजा गया था कुछ भी हो जाये वह जिन्दा रहेगा और जापानी सैनिक के  आने तक इन्तजार करेगा।

27 साल बाद अकटुबर 1972 में Onoda के आखिरी बचे साथी को भी फिलीपीन सैनिकों द्वारा मार गिराया गया। इसकी dead body जब जापान भेजी गई तो जापानी सेना हैरान हो गई। क्योंकि जापानी सेना ये मान चुकी थी अब तक उनके कोई सैनिक जिंदा नहीं रह सकते है। जापानी सेना को यकीन था कि सिर्फ Onoda ही एकमात्र सैनिक है जिसका अभी तक कोई सुराग नहीं था। और उन्हें अहसास हुआ कि वह अभी भी जिंदा हो सकता है।

Hiroo Onada

Onoda coming out of the jungle

जापानी सेना ने एक search party को फिलीपीन भेज दिया। मगर अकेला बचा Onoda 27 वर्षों में छुपने में माहिर हो चुका था। serach party उसे ढूंढ पाने में सफल हुए बिना ही वापिस चली गई।

इसके 2 साल बाद 1974 में एक जापानी युवक एवं कॉलेज स्टूडेंट Nario Suzuki ने world tour प्लान किया। इस tour में उसने कुछ ऐसी चीजों की लिस्ट बनाई जो वो करना चाहता था (he made a to do list)। जिसमे उसने तीन चीजों को खोज निकलने का मन बनाया था और वो तीन चीजें थी “Onoda, Panda तथा Snowman”।

हैरानी की बात थी पिछले 29 वर्ष जहां हजारों लोग onoda को नहीं तलाश पाए थे मगर Suzuki ने यह कर दिखाया। Suzuki उस टापू पर गया, वहां उसके सुराग पता किये और फिर उसे ढूंढने में कामयाब रहा। उसने Onoda को अपने घर चलने के किये मनाया। उसे बताया की किस तरह से 1945 में ही युद्ध समाप्त गो गया था। मगर Onoda मानने को तैयार नहीं था क्योंकि उसके कमांडर ने कहा था कि चाहे कुछ भी हो जाये युद्ध समाप्त होने के पश्चात वह उसे लेने जरूर आएगा।

वो जानता था उसे यहां से आसानी से नहीं जाने दिया जाएगा क्यूंकि पिछले 30 वर्षों में उस ने 30 फिकिपिन सैनिकों को मारा था और सैंकड़ों को घायल किया था। इस खबर के साथ Suzuki वापिस जापान लौट गया और सारी बात सेना को बता दी गई।

सेना ने उसके तत्कालकीन कमांडर Yashimata, जो अब रिटायर हो चुके थे और एक book स्टोर पर काम करते थे, उन्हें साथ लिया और फिलिपिन के उस टापू पर चले गए। वहाँ ले जाकर Onoda को उसके कमांडर ने समझाया  कि युद्ध समाप्त हो गया है और अब वह घर चल सकता है।

जब Onoda का सामना अपने कमांडर से हुआ तो सच्चाई जानने के बाद Onoda पूरी तरह से सदमे में पड़ गया। उसने जाना कि उसके 30 साल उसने यूँ ही गवाँ दिए। इसके इलावा न जाने कितने ही बेकसूर स्थानीय नागरिकों को शक के कारण मार दिया। यह बात भी वह सह नहीं पाया कि जापान ने दो शहरों में करीब 5,00,000 नागरिकों की जान गवाने के बाद समर्पण कर गया था।

Onoda Saluting His Commander

जल्दी ही Onoda ने आने आप को संभाला और महसूस किया कि Guerrilla fighter के उसके दिन अब पूरे हो गए हैं। 10 मार्च 1975 को 52 वर्षीय Onoda अपनी उसी जापानी वर्दी में जंगल से 30 वर्षों बाद बाहर निकल आया और तत्कालकीन फिकिपिन राष्ट्रपति को अपनी तलवार संपते हुए आत्मसमर्पण कर दिया।  राष्ट्रपति ने उसके गुनाहों को ये कहते हुए माफ कर दिया कि उसे लगता था कि वह अभी भी युद्ध लड़ रहा है।

Hiroo Onada

Onoda Surrendering His Samurai Sword to Philippines President

Onoda को जापान लौटने पर एक hero के रूप ने स्वीकारा और सम्मान दिया गया। उसके साहस, देश प्रेम, कर्म निष्ठा, त्याग और 30 वर्षों तक संघर्ष पूर्ण जवानी जीने के लिए उसे 30 वर्षों का वेतन भी दिया गया। हालांकि जब वह जापान लौटा तब तक जापान पूरी तरह से बदल गया था। ये बदला जापान (जो technology में अब विश्व की बड़ी ताकत था) भा नही रह था क्योंकि जिस पुरानी संस्कृति को वो जानता था वह आधुनिकता में कहीं खो गई थी। वह आगे का जीवन जीने के लिए ब्राजील के छोटे कस्बे में चल गया और वहीं पर शादी भी की।

Onoda with his retired commander

1996 में फिकिपिन के उसी टापू पर जाकर उसने गांव वालों को अपनी जमा पूंजी में से 10000 dollar का दान भी दिया। इसके बाद Onoda ने अपनी एक documentry भी release की जिसका नाम है “No Surrender, My Thirty Year War”. 17 जनवरी 2014 को 91 वर्ष की उम्र में इस महान योधा का देहांत हो गया।

Never Complain. When I did, my mother said that if I didn’t like my life, I could just give up and die. She reminded me that when I was Inside her, I told her that I wanted to be born, so she delivered me, brestfed me and changed my diapers. She said that I had to be brave. – Hiroo Onoda

 

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Image Sources: Internet

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Manoj Sharma

Writer, Trainer and Motivator

1 Comment

98Cheryl · January 30, 2018 at 3:46 am

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